
रिश्ते चाहे कितने ही बुरे हो उन्हे तोङना मत
क्योकि पानी चाहे कितना भी गंदा हो
अगर प्यास नही बुझा सकता वो आग तो बुझा सकता है
kayam hussain

प्रेम चुपचाप आता है और ज़िन्दगी बन जाता है
बहुत अच्छे लगते हैं खिलखिला कर हँसते चेहरे क्यों नहीं हंस पाते हम इनकी तरह। क्या हमारी हंसी दबाई नहीं गयी बचपन में? क्या जवानी की दहलीज़ पर, उदासीयों के बादलों ने नहीं घेरा हमारे वजूद को? क्या किसी धोखें ने नहीं कचोटा हमारी रूहों को क्या ढ़लती शामें हमें डराती नहीं? हम ढूंढ़ रहें हैं उस गुमशुदा हंसी को जो खो गयी कहीं जीवन की कटु सच्चाइयों में। और उसकी जगह एक गंभीरता ने चेहरे पर घेर ली हो, हमें अपना उपचार खुद करना होता है विलीन होने से पहले। वर्ना ये हंसीं यहीं छूट जाएगी और आत्मा ओढ़ कर जाएगी एक गंभीर उदासी अति गंभीरता भी एक रोग हैं। जो जकड़ लेता आपके शब्दों को जमा देता सुख और दुःख की अनुभूति को दुनिया में रहते हुए दुनिया को भूलने लगते खुद को पाने के लिए छटपटाते हुए।
हमको अपनी खोयी हंसीं याद आने लगती जो बिछड़ गयी थी वक़्त से पहले ही। हमारी मासूम होठों से ऐसा नहीं कि बीते सालों में हम मुस्कारायें नहीं। पर वो खनक लुप्त थी, जो भीतर के नीरव सन्नाटे को तोड़ पाती हँसतें हँसतें आंखें भर कर आत्मा को भिगो देती, वो नहीं हुआ। एक बेफिक्र हंसी को जन्म देना चाहते हैं जो वास्तविक हो। अभिनय न हो। दुःख में सुख का अभिनय करना, और जख्मी करता है जब कोई बोझ न हो दिमाग पर, आत्मा पर कोई खरोंच न हो। मन रुई के फाहे की तरह हल्का और सफ़ेद, किसी भी रंग में रंग जाने को तैयार हो जब ख़ुशी फूटे रोम-रोम से रेशमी कोपलों के मानिंद, ऐसे खिलखिला कर हंसने की ख़्वाहिश हैं। हम अपनी हंसी अपने साथ लेकर जाना चाहते हैं



जिदंगी मे अच्छे लोगो की तलाश मत करो
खुद अच्छे बन जाओ आपसे मिलकर शायद किसी की तालाश पूरी हो
नींद आएगी भला कैसे उसे शाम के बाद रोटियां भी न मयस्सर हों जिसे काम के बाद

काश देश में चुनाव होने को होता, मजदूरों को बसें भी मिलती, भोजन भी मिलता

पत्रकार ने एक मजदूर से जब पूछा कि सरकार 20 लाख करोड़ का मदद करने जा रही है ! मजदूर का बस इतना कहना काफी था कि जो एक "बस" का इंतजाम कर नही सकी 20 लाख करोड़ किसने देखा है !


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